विकृतियों पर विजय प्राप्त करना सिखाते हैं संस्कार :सरमण्डल

पंधाना । भारतीय संस्कृति शुचिता, सदभावना और सदप्रवृत्ति की परिचायक है । इसमें आत्मकल्याण के साथ-साथ जनकल्याण के भाव भी सन्निहित है । पुरातन सांस्कृतिक परम्पराएँ मनुष्य को श्रेष्ठ, समुन्नत और सुसंस्कृत बनाती हैं ,जिसका आध्यात्मिक ही नहीं वैज्ञानिक आधार भी है । संस्कृति के संवाहक संस्कार हैं, जो मानव-मन की दुर्बलता को दूर कर , विकृतियों पर विजय प्राप्त करना सिखाते हैं । अतएव तन को स्वस्थ, मन को निर्मल और जीवन को सार्थक बनाने के लिये भारतीय संस्कृति और संस्कारों को आत्मसात करना चाहिए ।
उक्त विचार शिक्षाविद डॉ. रीता सरमण्डल ने शहीद टण्टया मामा शासकीय महाविद्यालय पंधाना में व्यक्त किये ।
स्वामी विवेकानन्द करियर मार्गदर्शन योजना अंतर्गत आयोजित इस बौद्धिक आयोजन में डॉ. सरमण्डल ने वेद, वेदांग, उपनिषद , पुराण आदि में निहित उद्धरणों के माध्यम से भारतीय संस्कृति के तत्वों से अवगत कराया । उन्होंने कहा कि ब्रम्हा मुहूर्त में जागने से प्राणवायु संजीवनी की तरह कार्य करती है ।चरण स्पर्श से ऊर्जा और साष्टांग दंडवत करने से पृथ्वी की विद्युतीय शक्ति मिलती है । चंदन तिलक से आज्ञाचक्र सक्रिय होता है, और बल,बुद्धि व तेज बढ़ता है ।
कार्यकम में महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. अनूप सक्सेना ने कहा कि दया-करुणा, मानवता, परमार्थ और समाजहित की भावना ही भारतीय संस्कृति की पहचान है । सहस्त्रों आक्रमणों के बाद भी यह अक्षुण्ण-अविच्छिन्न बनी हुई है ।
कार्यक्रम में प्रो. आलोक रॉय, श्री मंगलेश सरमण्डल, डॉ. वेदप्रकाश मलानी, डॉ. रश्मि तिवारी , श्रीमती पूजा सरमण्डल , कार्यकम संयोजक श्रीमती सरोज मालवीय सहित विद्यार्थीगण मौजूद थे ।
संचालन डॉ. प्रवीण मालवीय ने किया व आभार डॉ. शाज़िया सिद्दीकी ने माना ।

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